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Wednesday, December 4, 2013

शकेब ज‌लाली की एक और गज‌ल


मजा‌ज को सोचते हुए अगर शकेब याद आएँ तो इसकी वजह तो किसी को ख़ोजनी ही चाहिए -- खास तौर पर तब जब कि शकेब 32 बरस की जिंदगी के बाद से बस रौशनी हो गए होँ और जिसे याद आ रहे हों वह कब का उस उमर को पीछे छोड़ चुका हो.....


वहाँ की रोशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत
मैं उस गली में अकेला था और साए बहुत

किसी के सर पे कभी टूटकर गिरा ही नहीं
इस आसमाँ ने हवा में क़दम जमाए बहुत

हवा का  रुख़ ही अचानक बदल गया वरना
महक के काफ़िले सहराँ की सिम्त आए बहुत

ये क़ायनात है मेरी ही ख़ाक का ज़र्रा
मैं अपने दश्त से गुज़रा तो भेद पाए बहुत

जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया
तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत

बस एक रात ठहरना है क्या गिला कीजे
मुसाफ़िरों को ग़नीमत है ये सराय बहुत

जमी रहेगी निगाहों पे तीरगी दिन भर
कि रात ख़्वाब में तारे उतर के आए बहुत

शकेब कैसी उड़ान अब वो पर ही टूट गए
कि ज़ेरे-दाम जब आए थे फड़फड़ाए बहुत.

Monday, August 29, 2011

सजा सख्त है बेगुनाही की यहाँ

एक मुद्दत हो गयी जबान को सुन्न पड़े हुए. आज कुछ कहा है -- पढ़ देखिए:

हर इक वार पर मुस्कराता हूँ
यूँ मैं जालिम को जलाता हूँ |

किए ख़ार अता हमें गुल ने
मम्नून हूँ, सर पे सजाता हूँ |

दरकुशाई तो अख्तियार उसका
मैं फ़कत फर्जे-आशिकी निभाता हूँ |

दिक न होवे वो बपहलुए रक़ीब
मैं दूर से सलाम बजा लाता हूँ |

सजा सख्त है बेगुनाही की यहाँ
इज्जे-मुंसिफ़ में चुप रह जाता हूँ |

ये तीरगी शदीद तर कि तूफ़ाँ ये
शम्मए दिल बारहा क्यूँ जलाता हूँ |

नालः चीज अक्सीर है सुजीत बड़ी
अश्के-रुख मैं इसी से सुखाता हूँ |
**********

Sunday, March 20, 2011

लहू मिरा रायगाँ न था

फूल ने तितली से कुछ कहा न था
दरम्याँ अब बचा कोई मुद्दआ न था

झुका तो था वो हस्बे-मामूल ही
दह्‌न-ए-गुंचा आज नीम – वा न था

रंग ही रंग जमीं, गुलाल उफ़क में
होलियाना मगर इस शाम फ़ज़ा न था

यूँ गर्के-अब्र हो जाएगा बादे-कुर्बत
दह्र को मह पे इसका गुमाँ न था

उस आतशे खुशूशी की हयादारी वल्लाह
तपिश रूह-कुशाँ, मगर कोई धुआँ न था

रंग लिए परचम अपने जब हजारों ने
कहा बिस्मिल ने, लहू मिरा रायगाँ न था

वक्त मुंसिफ़ को बताएगा इक दिन जरूर
मायूस-‌ओ-नाचार था, सुजीत बदगुमां न था
                    *********** 

Monday, March 14, 2011

किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे

इक बार कभी जिक्रे-खुदा तो मेरे दीवान में आवे
माहताब जो भूले से भी मेरे आसमान में आवे

बेकल तो रहते हैं हम उसकी सदा के लिए जरूर
इलाही कुछ लुत्फ उसे भी तो मेरे बयान में आवे

जाने है जमाना कि है शिफ़ा लम्स में उसके
हैफ़ किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे

बदहवास इतना है वो अपनी ही जुस्तजू में
कैसे छिन भर भी ये मुरीद उसके ध्यान में आवे

गुलाब चुन चुन जो रोज सजाता उसके लिए सुजीत
निशाँ इसके लहू का भी तो उस गुलदान में आवे
                         ********

Tuesday, March 8, 2011

मेरा साया सब्जाँ को रेत बना देता है


वह माहताब इतनी बुलन्दी पर बिस्तर रखता है
कभी खशो-खार-ओ-गुलाब नजर नहीं आता है

चलेगा कैसे वह गुँचा-पा मेरे साथ कदम भर भी
मेरा साया शबनमी सब्जाँ को रेत बना देता है

दर्द सिन्दूर का कहेगी किससे ये धरती की बेटी
राम परित्यागी, मनुहारी को जग रावण कहता है

इतना खोल दिया है खुद को उसके सामने हमने
इक वर्क अपना इस फटे बस्ते में धरते डरता है

हलक़ भींच के धोते हैं रुख अश्क से हम और
उसे शिकवा यह कि तू ताजा-दम न दिखता है

नफ़्स अपनी दबा रखे है सुजीत पा उसे फोन प
बेमुरव्वत अपनी गुफ्तगू को खत्म नहीं करता है

                                ******

Thursday, December 30, 2010

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं -- परवीन शाकिर की गज़ल

नींद तो ख्वाब हो गई शायद
जिन्से-नायाब हो गई शायद

अपने घर की तरह वो लड़की भी
नज्रे- सैलाब हो गई शायद

तुझ को सोचूँ तो रोशनी देखूँ ,
याद, महताब हो गई शायद

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं,
झील पायाब हो गई शायद

हिज्र के पानियों में इश्क की नाव,
कहीं गर्क़ाब हो गई शायद

चंद लोगों की दस्तरस में है
ज़ीस्त किमख़्वाब हो गई शायद
         **********

Monday, November 29, 2010

फोन किसी का सुनते हुए

अभी ही जाना है, मायूस था वह जो यह पूछते हुए
रुख्सत याद दिलाया है, फोन किसी का सुनते हुए।

जिरह-बख्तर बेकद्री के, शम्शीरे-बदजुबानी लिए
शहंशाह-फ़हम हूँ, गैर की बस्ती में गुजरते हुए।

परख-परख के राह, फूंक-फूंक कदम जो रखते हैं
नावीनगी छाती है उन्हीं पर अक्सर फिसलते हुए।

जोर तमाम लगाया बगूलों ने गिराने में जिसे
मुअत्तर हवा को कर गया वह गुल संभलते हुए।

तनाबकुशाई न की रात भर असीरे-आरिजे कंवल ने
पासे-शिगाफ़े-गुल ने रोका उसे मुहर-ब-लब करते हुए।

यह नहीं हरगिज़ कि नामालूम  हकी़कते-दाम उसे
माइल-ब-मुनाज़ात-ए-माहीगीर  है वह फंसते हुए।

होशमंद है बहुत सुजीत आमदे-शफ़क़ तक हर रोज
ज़ाँ-ब-लबी आ जाती है बस खयाले-महवश आते हुए।
                                   ********
इस रंग के पदों पर माउस रखने से आप उनके अर्थ देख सकते हैं |
यह व्यवस्था करने की सलाह देने वाले कवि मित्र श्री अजीत को धन्यवाद | 

Wednesday, October 20, 2010

ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है

वह माहताब को चरागे-सहर बना देता है
कभी कतरे को वह गुहर बना देता है ।

तासीर-ए-मेहर से अमीरे-शहर अक्सर
तुख्म-ए-गुल को शह-समर बना देता है ।

मुहब्बत की चिता का धुआँ कम्बख्त
शीरीं लबों को जाम-ए-जहर बना देता है ।

रब्त रसूखदारों से रखा करिए आप
ये बेहरूफ़ को भी सुखनवर बना देता है ।

इस्तेमाल करिए जो ज़ीने को जीने में
वह पिद्दी को भी नामवर बना देता है ।

मान लीजिए ये मशवरा सुजीत का वरना
ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है ।
               **********

Monday, August 23, 2010

जिसे आप गिनते थे आशना, जिसे आप कहते थे बावफा

आज मन में आ रहा है कि मोमिन की यह गज़ल भी आपके सामने रखूँ.

वो जो हम में तुम में करार था, तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का, तुम्हें याद हो के न याद हो.

वो नये गिले, वो शिकायतें, वो मज़े-मज़े की हिकायतें
वो हरेक बात पे रूठना, तुम्हें याद हो के न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई, जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयां से पहले ही भूलना, तुम्हें याद हो के न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझसे था आपका
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हमसे तुमसे भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो के न याद हो

हुए इत्तेफाक से गर बहम , वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिल- ए- मलामते-अक़रबा, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी बैठे सब हैं जो रू-ब-रू, तो इशारतों ही से गुफ्तुगू
वो बयान शौक़ का बरमाला, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो बिगाड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का
वो नहीं नहीं की हरेक अदा, तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना, जिसे आप कहते थे बावफा
मैं वही हूँ मोमिने-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो

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आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो

कुछ वक्त ऐसे आते हैं कि कुछ खास चीजें पढ़ने का बड़ा जी करता है।
आज खयाल आ रहा है कि बशीर बद्र की यह गज़ल आप सबसे शेयर करूँ।
अब याद नहीं आ रहा कि कहाँ से मिली थी यह जब इसे अपने कम्प्यूटर में रख लिया था।
देखिए कैसी लगती है:

कभी यूं भी आ मेरी आंख में, कि मेरी नजर को खबर न हो
मुझे एक रात नवाज दे, मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीमो करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूं तो मेरी दुआ में असर न हो

मेरे बाज़ुऔं में थकी थकी, अभी महवे ख्वाब है चांदनी
ना उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुजर न हो

ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आंखों में पिछली रात की चांदनी
ना बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियां, दिलोजान से दोनो क़ुबूल हैं
मगर उस नगर में ना कैद कर, जहां ज़िन्दगी का हवा न हो

कभी यूं मिलें कोई मसलेहत, कोई खौफ़ दिल में ज़रा न हो
मुझे अपनी कोई ख़बर ना हो, तुझे अपना कोई पता न हो

वो हजार बागों का बाग हो, तेरी बरकतो की बहार से
जहां कोई शाख़ हरी ना हो, जहां कोई फूल खिला न हो

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे
यूं दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो

कभी हम भी इस के क़रीब थे, दिलो जान से बढ कर अज़ीज़ थे
मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो

कभी दिन की धूप में झूम कर, कभी शब के फ़ूल को चूम कर
यूं ही साथ साथ चले सदा, कभी खत्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ, जरा और दिल के क़रीब आ
तुझे धडकनों में बसा लूं मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो.
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Tuesday, June 29, 2010

ग़ज़ल एक मेरी फिर

जो लोग उफनती मौज़ों से डर गए
वो सब के सब कनारों प’ ठहर गए ।

इस हिकारत से उन्हें पुकारा उसने
शर्मसार होके अश’आर मिरे मर गए ।

डोर दिल से उनकी बंधी थी यों कर
मोती तमाम पलकों पर ही ठहर गए ।

मंजिले-मकसूद थी सोहबत-ए-रहबर
इसीलिए कई लोग जानिबे-सफर गए ।

देखा बागवां को कैंची जो सीमी लिए
गुलाब सारे ही बाग के बिखर गए ।

दरिया को इतनी थी फ़िक्रे तश्‍नगी
सैलाब आया 'सुजीत' हम जिधर गए ।
***********

Sunday, May 23, 2010

कलीम आजिज़ की गज़ल

मेरे ही लहू पर गुजर औकात करो हो
मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो

दिन एक सितम एक सितम रात करो हो
कि दोस्त हो, दुश्मन को भी तुम मात करो हो

हम खाक-नशीं, तुम सितम आरा ए सरे- बाम
पास आके मिलो, दूर से क्या बात करो हो

हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है
हम, और भुला दें तुम्हें, क्या बात करो हो

यूँ तो मुझे मुँह फेर के देखो भी नहीं हो
जब वक्त पड़े है तो मदारात करो हो

दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो


बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो

अमीर खुसरो की एक मशहूर गज़ल

पिछली पोस्ट में सैकड़ों साल पहले के कवियों की रचनाओं का आनंद लेने के बारे में लिखते हुए मेरे मन में अमीर खुसरो (1253 – 1325 AD) की मशहूर गज़ल आ रही थी।
लीजिए वह गज़ल यहाँ प्रस्तुत है।

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां ।
जरूरतमंद की हालत की कर न उपेक्षा आँख छुपा न बना बातें
वियोग सहन-शक्ति न है ए प्रिय क्यों न आ के सीने से लगाते।

शबां-ए-हिजरां दराज़ चूं ज़ुल्फ़
रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां ।
जुल्फ सी लाँबी विरह निशा और मिलन के दिन उम्र से छोटे
सखि री प्रिय को न देखूँ तो कैसे गुजारूँ ये अंधेरी रातें।
यकायक अज़ दिल, दोचश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बबुर्द तस्कीं,
किसे पड़ी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां ।
औचक ले उड़ीं तस्कीन दिल से सौ धोकों भरी दो जादू भरी आँखें
है गर्ज किसे पड़ी कि जा बताए प्रिय को मिरे हाल की बातें।
चो शम्‍अ सोज़ाँ, चो ज़र्रा हैराँ
ज़ मह्रे आँ मह बगश्तम आख़िर
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां ।
दीप सी जलूँ धूल सी बिखरूँ होके उसके करम से महरूम आखिर
न चैन पड़े कुछ न आए नींद, जो न खत आता न वो खुद आते।

बहक्क-ए-रोज़े- विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, फरेब खुसरौ
सपेत मनके, दोराये राखूं
जो जाये पाऊँ, पिया के खतियां ।
प्रिय मिलन दिवस का नाम ले के दिया है धोका खुसरो ने
जो जा पाऊँ प्रीतम्र-प्रासाद, सजाऊँ दिल धर के सफेद मुक्ते ।

पोस्ट एडिटर के चौखटे में गज़ल डालते हुए खयाल आया तो अभी अभी एक भावानुवाद कर हर शे’र के नीचे वह भी डाल दिया है। यह सीधा कीबोर्ड पर किया गया प्रयास है – न पुनरीक्षित किया गया है न ही मैंने स्वयं से पद्यानुवाद की अपेक्षा की है। शायद कुछ काम आए।

Sunday, May 16, 2010

एक ग़ज़ल ग़ालिब के दीवान से

एक बहुत प्रिय मित्र ने कल इस चिट्ठे को देखा और फिर यह जहमत भी उठाई कि बाकायदा फोन कर अपनी सुविचारित टिप्पणी भी दी। आज उसी बात को सोचते हुए कुछ विचार आया और सोचा कि आपसे बाँटूं। छंद बद्ध अभिव्यक्तियाँ कई बार आबद्ध हो जाती हैं जबकि मुक्त छंद में अभिव्यक्ति पर कोई दबाव नहीं होता। अपनी पहली कविता "जन्मभूमि" में निराला ने कहा था "मुक्त बन्ध, घनानंद मुद मंगल कारी" और चार वर्ष बाद "प्रगल्भ प्रेम" में लिखा -- "अर्ध विकच इस हृदय-कमल में आ तू/ प्रिये, छोड़ कर बंधन मय छंदों की छोटी राह"।
खैर, यह भी सच है कि सिद्धहस्त कलमकार छंद के बंधनों में रहकर भी स्वच्छंद अभिव्यक्ति कर लेते हैं और ग़ालिब बड़े आराम से कहते हैं --
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे
जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे
साये की तरह साथ फिरें सर्व-ओ-सनोबर

तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
तय नाज़-ए-गिराँमायगी-ए-अश्क बजा है

जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँबार में आवे
दे मुझको शिकायत की इजाज़त कि सितमगर

कुछ तुझको मज़ा भी मेरे आज़ार में आवे
उस चश्म-ए-फ़ुसूँगर का अगर पाये इशारा

टूटी की तरह आईना गुफ़्तार में आवे
काँटों की ज़बाँ सूख गयी प्यास से या रब

इक आबलापा वादी-ए-पुरख़ार में आवे
मर जाऊँ न क्यों रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक

आग़ोश-ए-ख़ाम-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे
ग़ारतगर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-ज़र

क्यों शाहिद-ए-गुल बाग़ से बाज़ार में आवे
तब चाक-ए-गिरेबाँ का मज़ा है दिल-ए-नादाँ

जब इक नफ़स उलझा हुआ हर तार में आवे
आतिशकदा है सीना मेरा राज़-ए-निहाँ से

दे वाये अगर म'अरिज़-ए-इज़्हार में आवे
गंजीना-ए-म'अनी का तलिस्म उसको समझिये

जो लफ़्ज़ कि "ग़ालिब" मेरे अशआर में आवे

--- ग़ालिब की यह ग़ज़ल मैंने कविताकोश से ली है।
किन्तु अपने अधिक प्रिय अशआर को बोल्ड मैनें किया है।

Saturday, April 10, 2010

एक और ग़ज़ल

ये कायदा अपनी दुनिया का निराला है
हुस्ने-सुखन था अब जिसकी जुबाँ पे ताला है.
दरिया है बेकल अपने समन्दर के लिए

बशर है कि उसके इश्क में मतवाला है.
एड़ियाँ मिलेंगी उसे अह्सान की तरह

मौलसिरी सा जो कि खिलने वाला है.
माहताब है बेसुध अब्र के आगोश में

सहन हमारे में अश्क का उजाला है.
पूछ ले न कहीं चाँद दमकने का राज़

साँझ ढलते कमल सिमटने वाला है.
चलके शमए-दिल को आतिश-फिशां कर लूं

कि बरसरे सैर अब मेरा उजाला है.
धुल के और निखरेगा उनका सलोनापन सुजीत

तेरी आँख में अभी जो जल भरने वाला है.

Saturday, March 6, 2010

एक ग़ज़ल फिर

मैं बस अपनी गज़लें यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ इन दिनों, कोई पढ़े शायद और बताए कि क्या केवल अपनी ग़ज़लें पोस्ट करना ठीक है या ... और शायद कोई यह भी बताए कि ये गज़लें ठीक हैं या ...

शायद अच्छा शब्द है । बड़ा सुकून देता है सोचना कि जो नहीं हो रहा है और इप्सित है वह शायद कभी हो ।

खैर, ग़ज़ल हाज़िर है:

हो उठा है बहुत अंधकार शहर में
अपेक्षा हुई है अब अधिकार शहर में

तुम भावना आराधना की बात करो यहाँ
सत्य तो है अब मात्र व्यापार शहर में

हर सरिता को बाँधते हैं तटबंध में वे
असीमित एषणा हो रही साकार शहर में

मैत्री, स्नेह, अनुराग की ऋतु नहीं अब
लालित्य का है अंतिम संस्कार शहर में

सुजीत किधर देखोगे कि धुआँ न मिले
अग्नि का अब नहीं पारावार शहर में
**********

Friday, March 5, 2010

अग्नि अग्नि में भी बड़ा विचित्र अंतर होता है

4-5 दिनों से अपने चिट्ठे पर आया ही नहीं। क्षमा चाहता हूँ।
कभी यह ग़ज़ल लिखी थी। आप पढेंगे?

ऐसा ही तो इस धरा पर अक्सर होता है
हर हृदय की तरफ तना एक नश्तर होता है

जिधर कहीं किसी कुँज में बैठे हों दो जन
आ रहा कहीं से उधर ही कोई पत्थर होता है

सजे कागजों पर सधी लिखाई एक भरम है मात्र
जहर बुझा इन पत्रों का तो हर अक्षर होता है

प्रश्न वही मथा-निचोड़ा हृदयों को करते हैं मित्र
निश्चित नहीं जिनका कोई भी उत्तर होता है

यूँ भीष्म भी बहुत तो पाए नहीं जाते किन्तु
चुभते शरों का ही सदा उनका अंतिम बिस्तर होता है

वह आरती सी जलती है तुम चिता सा सुलगते हो
अग्नि अग्नि में भी बड़ा विचित्र अंतर होता है

अपराध तो सुजीत हो ही जाया करते हैं
प्रायश्चित कि दंड का कहाँ सदा अवसर होता
है
********

Friday, February 26, 2010

एक ग़ज़ल, शायद पसंद आए

मेरी ही एक ग़ज़ल और पढ़िए।

किसी को मेरा किस्सा तुम अगर कहना
रहे ध्यान कि मत हँस कर कहना

फेंकती दृष्टि संसार की जिसे सर पर मेरे
प्राणाधार मेरे, उसे ही तुम पत्थर कहना

प्रिय जिसको दृष्टि से अपनी गिरा फेंके
अयि भाषा-प्राण, तू उसे ही बेघर कहना

शोणित सिक्त शूलों से जो दिखे बना सा
हर उस पगडंडिका को तू मेरी डगर कहना

सूखेगा न कभी सुजीत की आँख का खारा पानी
है तेरी दृक्नीलिमा भरी, इसे तू समंदर कहना

*************

Wednesday, February 24, 2010

एक हिंदी ग़ज़ल

मेरी एक ग़ज़ल प्रस्तुत है।

यह प्रकरण नहीं है किसी अभिव्यक्ति का
विरह नहीं है मूल्य संगत अनुरक्ति का

हर पुष्प हो स्वीकार्य ही आराध्य को क्यों
होता है कहाँ बंधनकारी नियम भक्ति का

प्रतिदान न सही, उपेक्षा भी तो न करे प्रिय
यह आग्रह तो है सदा किन्तु हर व्यक्ति का

इस द्विधा का एक समाधान मिले कहाँ
अपेक्षा संग त्याग चले, पथ यह आसक्ति का

बंधन अमित हैं सुजीत आराधना के आभरण पर
कौन करे क्या उपाय इसकी मुक्ति का
***********

Saturday, February 20, 2010

एक ग़ज़ल मेरी भी पढ़िए

एक अपनी ग़ज़ल आपकी नज़र कर रहा हूँ। अच्छी लगे तो बताकर कृपया हौसला अफजाई करें, और अगर इसे बेहतर बनाने के ख़याल से कुछ तरतीम करने की जहमत उठाएं और भी कृतज्ञ होऊँगा :

हमसफ़र उसका कौन कभी भी रह पाता है
दस दस कदम पर जो रस्ता बदल जाता है।

खारे - गुल, दागे - माहताब, ताबे-खुर्शीद
खुश हो कैसे, यही जिसको नजर आता है।

लुकमान क्या छुडाए उसका आधाशीशी
हर अफकार को जो अहबाब से छुपाता है ।

फूल तो झड न पाएँगे उसकी छाती पर
जो दरिया सदा कनारों में आग लगाता है।

अलिफ़ से हे तक सीधे पढने वालो
बीच से बांचना भी बवक्त काम आता है।

शदीद अकीदत से जो बाम पे धरा जाए
वो दिया तूफानों को राह दिखाता है।

अल्लाह ही हाफिज उसके मुस्तकबिल का
सम्रे इमरोज जो किर्मे दीरोज को खिलाता है।

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