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Thursday, December 30, 2010

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं -- परवीन शाकिर की गज़ल

नींद तो ख्वाब हो गई शायद
जिन्से-नायाब हो गई शायद

अपने घर की तरह वो लड़की भी
नज्रे- सैलाब हो गई शायद

तुझ को सोचूँ तो रोशनी देखूँ ,
याद, महताब हो गई शायद

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं,
झील पायाब हो गई शायद

हिज्र के पानियों में इश्क की नाव,
कहीं गर्क़ाब हो गई शायद

चंद लोगों की दस्तरस में है
ज़ीस्त किमख़्वाब हो गई शायद
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Wednesday, February 17, 2010

परवीन शाकिर की एक और ग़ज़ल

इसे भी देखिये:
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की
तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की
उस ने जलती हुई पेशानी पे जो हाथ रखा
रूह तलक आ गई तासीर मसीहाई की
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“नींद जब ख़्वाबों से प्यारी हो” -- परवीन शाकिर

परवीन शाकिर मेरे प्रिय शायरों में से एक हैं। उनका जन्म 24 नवम्बर 1952 को हुआ और निधन 26 दिसम्बर १९९४ को। मात्र ४२ वर्ष के जीवन में उन्होंने जो जो लिखा उसे किसी भी शायर के कलम से कम आंकना कमतरी होगी। उनकी कुछ गज़लें पोस्ट करूंगा। अभी एक मुलाहिजा फरमाएँ। देखिये - "नींद जब ख़्वाबों से प्यारी हो तो ऐसे अह'द में ख़्वाब देखे कौन और ख़्वाबों को दे ताबीर कौन" - और सोचिये यह २०१० में पुरानी हुई क्या.

पा-बा-गिल सब हें रिहा'ई की करे तदबीर कौन
दस्त -बस्ता शह'र में खोले मेरी ज़ंजीर कौन
मेरा सर हाज़िर है लेकिन मेरा मुंसिफ देख ले
कर रहा है मेरे फर्द-ए-जुर्म को तहरीर कौन
मेरी चादर तो छीनी थी शाम की तनहा'ई ने
बे- रिदा'ई को मेरी फिर दे गया तश-हीर कौन
नींद जब ख़्वाबों से प्यारी हो तो ऐसे अह'द में
ख़्वाब देखे कौन और ख़्वाबों को दे ताबीर कौन
रेत अभी पिछले मकानों की ना वापस आ'ई थी
फिर लब-ए-साहिल घरोंदा कर गया तामीर कौन
सारे रिश्ते हिज्रतों में साथ देते हैं तो फिर
शहर से जाते हु'ए होता है दामन-गीर कौन
दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं
देखना है खींचता है मुझपे पेहला तीर कौन
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