जो लोग उफनती मौज़ों से डर गए
वो सब के सब कनारों प’ ठहर गए ।
इस हिकारत से उन्हें पुकारा उसने
शर्मसार होके अश’आर मिरे मर गए ।
डोर दिल से उनकी बंधी थी यों कर
मोती तमाम पलकों पर ही ठहर गए ।
मंजिले-मकसूद थी सोहबत-ए-रहबर
इसीलिए कई लोग जानिबे-सफर गए ।
देखा बागवां को कैंची जो सीमी लिए
गुलाब सारे ही बाग के बिखर गए ।
दरिया को इतनी थी फ़िक्रे तश्नगी
सैलाब आया 'सुजीत' हम जिधर गए ।
***********
Tuesday, June 29, 2010
ग़ज़ल एक मेरी फिर
Wednesday, June 23, 2010
स्मृति थामती है बागडोर
हँसी-मज़ाक, किताबें, पत्र-पत्रिकाएँ,
कथा-कविता, कर्म, कृति, उद्योग – –
कितने घूँघटों में छुपकर रहती है
कितने जतन से, कितने-कितने साल
लजीली-सी उदासी :
चिर-यौवना, असूर्यम्पश्या, अनन्या, अर्धांगिनी ।
छू कर किसी कोने को हृदय के
बनाता है अति-उर्वर उसे कोई
अपने सरस स्पर्श से
और फिर बोता है बीज एक
अकेलेपन का,
साथ-साथ चलते-चलते ।
सिंच-सिंच कर पानियों से
बढ़ती उमर के तकाज़ों,
बच्चों की भीगती मसों,
और
स्थानीय समझौतों की अनिवार्यताओं के,
बढ़ती है पौध,
फूल-फल लगते हैं.
अकेले अंधेरे कमरों में कई बार
बरस-बरस जाती हैं आँखें भी,
और कुछ फल शाख से
गिरते हैं जड़ों के गिर्द
कि उगें और पौधें, फूलें- फलें ।
एक बीज बालाखिर बनता है
जंगल हरा-भरा, घना-घटाटोप
कि खो जाती है हृत्भू
एकाकीपन के इस असिपत्रवन की छाया में ।
और तब स्मृति थामती है बागडोर ।
छठवीं जून को छठी राजधानी के जनपथ पर
शाम के छः बजे चलते हुए
किसी भी रंग की लेगिंग्स में कसे पैर
दीखने लगते हैं अब
पहली जून को राजगढ़ में दिखी
पीले कुर्ते, कत्थई लेगिंग्स से आवृत छब-से,
और
खुली आँखों के सामने
चलने लगते हैं चित्र
पिछली पहली जून के;
घुसपैठ करने लगते हैं
हॉर्न की चीख भरे कानों में
पिछली पन्द्रहवीं फ़रवरी को सुने सुर
और अभी गुजरी चौदहवीं सितम्बर के नाद ।
स्मृति
कस कर खेंचती है लगाम
और छलछला उठता है रक्त
होठों की कोर में,
कि दूर-दूर तक दिखती नहीं
कोई उँगली उठती पोंछने जिसे ।
एकाकीत्व के वन में
युवा हो उठता है एक और पेड़ :
और-और असमर्थ हो उठती है
खोजने में
खोए इस मनुष्य को
जिंदगी ।
ओस बदल लेती है राह
रेत, कंटक, असिपत्र से परे
कहीं उस ओर
जिधर गुलाब अभी बाकी है ।
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कथा-कविता, कर्म, कृति, उद्योग – –
कितने घूँघटों में छुपकर रहती है
कितने जतन से, कितने-कितने साल
लजीली-सी उदासी :
चिर-यौवना, असूर्यम्पश्या, अनन्या, अर्धांगिनी ।
छू कर किसी कोने को हृदय के
बनाता है अति-उर्वर उसे कोई
अपने सरस स्पर्श से
और फिर बोता है बीज एक
अकेलेपन का,
साथ-साथ चलते-चलते ।
सिंच-सिंच कर पानियों से
बढ़ती उमर के तकाज़ों,
बच्चों की भीगती मसों,
और
स्थानीय समझौतों की अनिवार्यताओं के,
बढ़ती है पौध,
फूल-फल लगते हैं.
अकेले अंधेरे कमरों में कई बार
बरस-बरस जाती हैं आँखें भी,
और कुछ फल शाख से
गिरते हैं जड़ों के गिर्द
कि उगें और पौधें, फूलें- फलें ।
एक बीज बालाखिर बनता है
जंगल हरा-भरा, घना-घटाटोप
कि खो जाती है हृत्भू
एकाकीपन के इस असिपत्रवन की छाया में ।
और तब स्मृति थामती है बागडोर ।
छठवीं जून को छठी राजधानी के जनपथ पर
शाम के छः बजे चलते हुए
किसी भी रंग की लेगिंग्स में कसे पैर
दीखने लगते हैं अब
पहली जून को राजगढ़ में दिखी
पीले कुर्ते, कत्थई लेगिंग्स से आवृत छब-से,
और
खुली आँखों के सामने
चलने लगते हैं चित्र
पिछली पहली जून के;
घुसपैठ करने लगते हैं
हॉर्न की चीख भरे कानों में
पिछली पन्द्रहवीं फ़रवरी को सुने सुर
और अभी गुजरी चौदहवीं सितम्बर के नाद ।
स्मृति
कस कर खेंचती है लगाम
और छलछला उठता है रक्त
होठों की कोर में,
कि दूर-दूर तक दिखती नहीं
कोई उँगली उठती पोंछने जिसे ।
एकाकीत्व के वन में
युवा हो उठता है एक और पेड़ :
और-और असमर्थ हो उठती है
खोजने में
खोए इस मनुष्य को
जिंदगी ।
ओस बदल लेती है राह
रेत, कंटक, असिपत्र से परे
कहीं उस ओर
जिधर गुलाब अभी बाकी है ।
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Friday, June 11, 2010
वह तुम थी
चमकन लागीं पथराई अँखियाँ,
उभर आए गीत कंठ से थके पंछियों के,
छू गई हुलसती वनलता
और खिल उठे
फूल बदबदा कर बूढ़े गूलर में ।
झुक-झुक आए मेह,
उठ-उठ बढ़ी सरिता,
कि दूर क्षितिज के पास
ज्यों अकस्मात
छू गए रसाक्त अधर शैलसुता के
भरे-भरे भारी, प्यास से धूसर,
वारिधितनय के ओष्ठ-द्वय से ।
बंसोट छिन में बदली
बाँसुरियों के वन में,
नभ का संगीत बनाती-सी
भू के निःश्वास को ।
लाल हुए टेसू सारे,
बौरा गए सब आम,
ले भाग धनु वृद्ध इन्द्र का
उतरा नभ तल पर चपल युवा पुष्पशर ।
भर गई गंध,
कि ज्यों फूल उट्ठे कहीं
कोटि-कोटि कचनार ।
गुलमोहर ने भर दिए आँचल हवा के,
और लगा पसीजने चाँद उसकी शाखों में
छान रही हो प्रकृति जैसे
दूधिया ठंडई
पीली मलमल के कपड़े से
कि मिल सके सोम-श्लथ देवों को
मस्तियाँ कुछ जमीं से भी ।
यह पावस नहीं था न वसंत,
कवि-स्वप्न तो न ही था,
वह भी न था जिसे हिकारत से कहती हो तुम
“शेरो – शायरी” किसी सस्ते तुक्कड़ की ।
यह मात्र अनुभव था उस घड़ी एक भर का
जब तुम पहुँची थी वहाँ
जहाँ मैं ले जाया करता हूँ खुद को
तब, जब हो पाता हूँ
अकेला, अपने सिर्फ अपने, साथ ।
************
उभर आए गीत कंठ से थके पंछियों के,
छू गई हुलसती वनलता
और खिल उठे
फूल बदबदा कर बूढ़े गूलर में ।
झुक-झुक आए मेह,
उठ-उठ बढ़ी सरिता,
कि दूर क्षितिज के पास
ज्यों अकस्मात
छू गए रसाक्त अधर शैलसुता के
भरे-भरे भारी, प्यास से धूसर,
वारिधितनय के ओष्ठ-द्वय से ।
बंसोट छिन में बदली
बाँसुरियों के वन में,
नभ का संगीत बनाती-सी
भू के निःश्वास को ।
लाल हुए टेसू सारे,
बौरा गए सब आम,
ले भाग धनु वृद्ध इन्द्र का
उतरा नभ तल पर चपल युवा पुष्पशर ।
भर गई गंध,
कि ज्यों फूल उट्ठे कहीं
कोटि-कोटि कचनार ।
गुलमोहर ने भर दिए आँचल हवा के,
और लगा पसीजने चाँद उसकी शाखों में
छान रही हो प्रकृति जैसे
दूधिया ठंडई
पीली मलमल के कपड़े से
कि मिल सके सोम-श्लथ देवों को
मस्तियाँ कुछ जमीं से भी ।
यह पावस नहीं था न वसंत,
कवि-स्वप्न तो न ही था,
वह भी न था जिसे हिकारत से कहती हो तुम
“शेरो – शायरी” किसी सस्ते तुक्कड़ की ।
यह मात्र अनुभव था उस घड़ी एक भर का
जब तुम पहुँची थी वहाँ
जहाँ मैं ले जाया करता हूँ खुद को
तब, जब हो पाता हूँ
अकेला, अपने सिर्फ अपने, साथ ।
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Sunday, May 23, 2010
कलीम आजिज़ की गज़ल
मेरे ही लहू पर गुजर औकात करो हो
मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो
दिन एक सितम एक सितम रात करो हो
कि दोस्त हो, दुश्मन को भी तुम मात करो हो
हम खाक-नशीं, तुम सितम आरा ए सरे- बाम
पास आके मिलो, दूर से क्या बात करो हो
हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है
हम, और भुला दें तुम्हें, क्या बात करो हो
यूँ तो मुझे मुँह फेर के देखो भी नहीं हो
जब वक्त पड़े है तो मदारात करो हो
दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो
बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो
मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो
दिन एक सितम एक सितम रात करो हो
कि दोस्त हो, दुश्मन को भी तुम मात करो हो
हम खाक-नशीं, तुम सितम आरा ए सरे- बाम
पास आके मिलो, दूर से क्या बात करो हो
हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है
हम, और भुला दें तुम्हें, क्या बात करो हो
यूँ तो मुझे मुँह फेर के देखो भी नहीं हो
जब वक्त पड़े है तो मदारात करो हो
दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो
बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो
अमीर खुसरो की एक मशहूर गज़ल
पिछली पोस्ट में सैकड़ों साल पहले के कवियों की रचनाओं का आनंद लेने के बारे में लिखते हुए मेरे मन में अमीर खुसरो (1253 – 1325 AD) की मशहूर गज़ल आ रही थी।
लीजिए वह गज़ल यहाँ प्रस्तुत है।
ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां ।
जरूरतमंद की हालत की कर न उपेक्षा आँख छुपा न बना बातें
वियोग सहन-शक्ति न है ए प्रिय क्यों न आ के सीने से लगाते।
शबां-ए-हिजरां दराज़ चूं ज़ुल्फ़
रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां ।
जुल्फ सी लाँबी विरह निशा और मिलन के दिन उम्र से छोटे
सखि री प्रिय को न देखूँ तो कैसे गुजारूँ ये अंधेरी रातें।
यकायक अज़ दिल, दोचश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बबुर्द तस्कीं,
किसे पड़ी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां ।
औचक ले उड़ीं तस्कीन दिल से सौ धोकों भरी दो जादू भरी आँखें
है गर्ज किसे पड़ी कि जा बताए प्रिय को मिरे हाल की बातें।
चो शम्अ सोज़ाँ, चो ज़र्रा हैराँ
ज़ मह्रे आँ मह बगश्तम आख़िर
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां ।
दीप सी जलूँ धूल सी बिखरूँ होके उसके करम से महरूम आखिर
न चैन पड़े कुछ न आए नींद, जो न खत आता न वो खुद आते।
बहक्क-ए-रोज़े- विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, फरेब खुसरौ
सपेत मनके, दोराये राखूं
जो जाये पाऊँ, पिया के खतियां ।
प्रिय मिलन दिवस का नाम ले के दिया है धोका खुसरो ने
जो जा पाऊँ प्रीतम्र-प्रासाद, सजाऊँ दिल धर के सफेद मुक्ते ।
पोस्ट एडिटर के चौखटे में गज़ल डालते हुए खयाल आया तो अभी अभी एक भावानुवाद कर हर शे’र के नीचे वह भी डाल दिया है। यह सीधा कीबोर्ड पर किया गया प्रयास है – न पुनरीक्षित किया गया है न ही मैंने स्वयं से पद्यानुवाद की अपेक्षा की है। शायद कुछ काम आए।
लीजिए वह गज़ल यहाँ प्रस्तुत है।
ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल,
दुराये नैना बनाये बतियां
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान,
न लेहो काहे लगाये छतियां ।
जरूरतमंद की हालत की कर न उपेक्षा आँख छुपा न बना बातें
वियोग सहन-शक्ति न है ए प्रिय क्यों न आ के सीने से लगाते।
शबां-ए-हिजरां दराज़ चूं ज़ुल्फ़
रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह,
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां ।
जुल्फ सी लाँबी विरह निशा और मिलन के दिन उम्र से छोटे
सखि री प्रिय को न देखूँ तो कैसे गुजारूँ ये अंधेरी रातें।
यकायक अज़ दिल, दोचश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बबुर्द तस्कीं,
किसे पड़ी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां ।
औचक ले उड़ीं तस्कीन दिल से सौ धोकों भरी दो जादू भरी आँखें
है गर्ज किसे पड़ी कि जा बताए प्रिय को मिरे हाल की बातें।
चो शम्अ सोज़ाँ, चो ज़र्रा हैराँ
ज़ मह्रे आँ मह बगश्तम आख़िर
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां ।
दीप सी जलूँ धूल सी बिखरूँ होके उसके करम से महरूम आखिर
न चैन पड़े कुछ न आए नींद, जो न खत आता न वो खुद आते।
बहक्क-ए-रोज़े- विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, फरेब खुसरौ
सपेत मनके, दोराये राखूं
जो जाये पाऊँ, पिया के खतियां ।
प्रिय मिलन दिवस का नाम ले के दिया है धोका खुसरो ने
जो जा पाऊँ प्रीतम्र-प्रासाद, सजाऊँ दिल धर के सफेद मुक्ते ।
पोस्ट एडिटर के चौखटे में गज़ल डालते हुए खयाल आया तो अभी अभी एक भावानुवाद कर हर शे’र के नीचे वह भी डाल दिया है। यह सीधा कीबोर्ड पर किया गया प्रयास है – न पुनरीक्षित किया गया है न ही मैंने स्वयं से पद्यानुवाद की अपेक्षा की है। शायद कुछ काम आए।
कविता की दुरुहता – एक विमर्श की आवश्यकता
किसी मित्र ने कल कहा कि उसे हिन्दी साहित्य में रुचि है और समय निकाल कर पढ़ता भी है पर “कविताएँ नहीं पढ़ता क्योंकि वह श्रमसाध्य होता है. समझने में मेहनत करनी पड़ती है.”
यह जो दुरुहता का “आरोप” है, वह मात्र पाठकीय संभ्रम है, रचनाकारों से पाठक-अपेक्षा की अभिव्यक्ति है, या फिर कविता के सहज गुणधर्म (गागर में सागर, चम्मच भर में चाँद या फिर कलशी में कलाश्निकोव भी भर लेने की क्षमता) के प्रति श्लाधा – यह एक विमर्श, एक बहस का मुद्दा हो सकता है।
फास्ट फूड – और एक अन्य मित्र के शब्दों में “disemvoweled SMSes” – के इस आपाधापी के दौर में पाठ्य साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता ऐसे ही छीज चुकी है. बचे खुचे पाठक-वर्ग में भी थोड़ा समय, थोड़ी अटेंशन देकर कविता को समझने-आस्वादने के प्रति उत्पन्न हो रही अरुचि के कारण आसन्न संकट के प्रति हम यदि उदासीन रहे तो आज जो कुछ लोग सैकड़ों साल पहले के कवियों की रचनाओं का भी आनंद लेते हैं, उन्हीं लोगों की आगामी पीढ़ियों को चालीस वर्ष पूर्व के भी कवि अज्ञात होंगे.
यह जो दुरुहता का “आरोप” है, वह मात्र पाठकीय संभ्रम है, रचनाकारों से पाठक-अपेक्षा की अभिव्यक्ति है, या फिर कविता के सहज गुणधर्म (गागर में सागर, चम्मच भर में चाँद या फिर कलशी में कलाश्निकोव भी भर लेने की क्षमता) के प्रति श्लाधा – यह एक विमर्श, एक बहस का मुद्दा हो सकता है।
फास्ट फूड – और एक अन्य मित्र के शब्दों में “disemvoweled SMSes” – के इस आपाधापी के दौर में पाठ्य साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता ऐसे ही छीज चुकी है. बचे खुचे पाठक-वर्ग में भी थोड़ा समय, थोड़ी अटेंशन देकर कविता को समझने-आस्वादने के प्रति उत्पन्न हो रही अरुचि के कारण आसन्न संकट के प्रति हम यदि उदासीन रहे तो आज जो कुछ लोग सैकड़ों साल पहले के कवियों की रचनाओं का भी आनंद लेते हैं, उन्हीं लोगों की आगामी पीढ़ियों को चालीस वर्ष पूर्व के भी कवि अज्ञात होंगे.
Sunday, May 16, 2010
एक ग़ज़ल ग़ालिब के दीवान से
एक बहुत प्रिय मित्र ने कल इस चिट्ठे को देखा और फिर यह जहमत भी उठाई कि बाकायदा फोन कर अपनी सुविचारित टिप्पणी भी दी। आज उसी बात को सोचते हुए कुछ विचार आया और सोचा कि आपसे बाँटूं। छंद बद्ध अभिव्यक्तियाँ कई बार आबद्ध हो जाती हैं जबकि मुक्त छंद में अभिव्यक्ति पर कोई दबाव नहीं होता। अपनी पहली कविता "जन्मभूमि" में निराला ने कहा था "मुक्त बन्ध, घनानंद मुद मंगल कारी" और चार वर्ष बाद "प्रगल्भ प्रेम" में लिखा -- "अर्ध विकच इस हृदय-कमल में आ तू/ प्रिये, छोड़ कर बंधन मय छंदों की छोटी राह"।
खैर, यह भी सच है कि सिद्धहस्त कलमकार छंद के बंधनों में रहकर भी स्वच्छंद अभिव्यक्ति कर लेते हैं और ग़ालिब बड़े आराम से कहते हैं --
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे
जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे
साये की तरह साथ फिरें सर्व-ओ-सनोबर
तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
तय नाज़-ए-गिराँमायगी-ए-अश्क बजा है
जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँबार में आवे
दे मुझको शिकायत की इजाज़त कि सितमगर
कुछ तुझको मज़ा भी मेरे आज़ार में आवे
उस चश्म-ए-फ़ुसूँगर का अगर पाये इशारा
टूटी की तरह आईना गुफ़्तार में आवे
काँटों की ज़बाँ सूख गयी प्यास से या रब
इक आबलापा वादी-ए-पुरख़ार में आवे
मर जाऊँ न क्यों रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक
आग़ोश-ए-ख़ाम-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे
ग़ारतगर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-ज़र
क्यों शाहिद-ए-गुल बाग़ से बाज़ार में आवे
तब चाक-ए-गिरेबाँ का मज़ा है दिल-ए-नादाँ
जब इक नफ़स उलझा हुआ हर तार में आवे
आतिशकदा है सीना मेरा राज़-ए-निहाँ से
दे वाये अगर म'अरिज़-ए-इज़्हार में आवे
गंजीना-ए-म'अनी का तलिस्म उसको समझिये
जो लफ़्ज़ कि "ग़ालिब" मेरे अशआर में आवे
--- ग़ालिब की यह ग़ज़ल मैंने कविताकोश से ली है।
किन्तु अपने अधिक प्रिय अशआर को बोल्ड मैनें किया है।
खैर, यह भी सच है कि सिद्धहस्त कलमकार छंद के बंधनों में रहकर भी स्वच्छंद अभिव्यक्ति कर लेते हैं और ग़ालिब बड़े आराम से कहते हैं --
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे
जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे
साये की तरह साथ फिरें सर्व-ओ-सनोबर
तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
तय नाज़-ए-गिराँमायगी-ए-अश्क बजा है
जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँबार में आवे
दे मुझको शिकायत की इजाज़त कि सितमगर
कुछ तुझको मज़ा भी मेरे आज़ार में आवे
उस चश्म-ए-फ़ुसूँगर का अगर पाये इशारा
टूटी की तरह आईना गुफ़्तार में आवे
काँटों की ज़बाँ सूख गयी प्यास से या रब
इक आबलापा वादी-ए-पुरख़ार में आवे
मर जाऊँ न क्यों रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक
आग़ोश-ए-ख़ाम-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे
ग़ारतगर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-ज़र
क्यों शाहिद-ए-गुल बाग़ से बाज़ार में आवे
तब चाक-ए-गिरेबाँ का मज़ा है दिल-ए-नादाँ
जब इक नफ़स उलझा हुआ हर तार में आवे
आतिशकदा है सीना मेरा राज़-ए-निहाँ से
दे वाये अगर म'अरिज़-ए-इज़्हार में आवे
गंजीना-ए-म'अनी का तलिस्म उसको समझिये
जो लफ़्ज़ कि "ग़ालिब" मेरे अशआर में आवे
--- ग़ालिब की यह ग़ज़ल मैंने कविताकोश से ली है।
किन्तु अपने अधिक प्रिय अशआर को बोल्ड मैनें किया है।
Tuesday, May 4, 2010
मेरी कुछ कविताएँ
मेरी पाँच कविताएँ अभी कृत्या के मई अंक में आई हैं। यदि पढ़ना चाहें तो दो लिंक हाज़िर हैं :
http://www.kritya.in/0511/hn/poetry_at_our_time6.html पर चार कविताएँ हैं और
http://www.kritya.in/0511/hn/poetry_at_our_time.html
पर मेरी एक अन्य कविता के साथ ही साथ कई अन्य कवियों की कविताएँ भी।
कभी पढ़ें, अच्छी लगेंगी।
http://www.kritya.in/0511/hn/poetry_at_our_time6.html पर चार कविताएँ हैं और
http://www.kritya.in/0511/hn/poetry_at_our_time.html
पर मेरी एक अन्य कविता के साथ ही साथ कई अन्य कवियों की कविताएँ भी।
कभी पढ़ें, अच्छी लगेंगी।
Saturday, April 10, 2010
एक और ग़ज़ल
ये कायदा अपनी दुनिया का निराला है
हुस्ने-सुखन था अब जिसकी जुबाँ पे ताला है.
दरिया है बेकल अपने समन्दर के लिए
बशर है कि उसके इश्क में मतवाला है.
एड़ियाँ मिलेंगी उसे अह्सान की तरह
मौलसिरी सा जो कि खिलने वाला है.
माहताब है बेसुध अब्र के आगोश में
सहन हमारे में अश्क का उजाला है.
पूछ ले न कहीं चाँद दमकने का राज़
साँझ ढलते कमल सिमटने वाला है.
चलके शमए-दिल को आतिश-फिशां कर लूं
कि बरसरे सैर अब मेरा उजाला है.
धुल के और निखरेगा उनका सलोनापन सुजीत
तेरी आँख में अभी जो जल भरने वाला है.
हुस्ने-सुखन था अब जिसकी जुबाँ पे ताला है.
दरिया है बेकल अपने समन्दर के लिए
बशर है कि उसके इश्क में मतवाला है.
एड़ियाँ मिलेंगी उसे अह्सान की तरह
मौलसिरी सा जो कि खिलने वाला है.
माहताब है बेसुध अब्र के आगोश में
सहन हमारे में अश्क का उजाला है.
पूछ ले न कहीं चाँद दमकने का राज़
साँझ ढलते कमल सिमटने वाला है.
चलके शमए-दिल को आतिश-फिशां कर लूं
कि बरसरे सैर अब मेरा उजाला है.
धुल के और निखरेगा उनका सलोनापन सुजीत
तेरी आँख में अभी जो जल भरने वाला है.
Thursday, April 8, 2010
एक कविता -- इक घूँट भर आवाज की प्यास
देखिये और कहिये कि क्या यह कविता है? और हाँ तो फिर क्या इसने आपका समय बर्बाद किया?
मिस हो न जाए तुम्हारी काल,
डोलता रहा हूँ
मैं मोबाइल को मुट्ठी में लिए हुए,
कि लगता है वक्त काल लेने में
जेब से निकालकर
और कहीं
हो न जाएँ खामोश
घंटियाँ थक कर.
आग उगलती धूप के इस मौसम में
जीता रहा हूँ मैं
पीकर ओस कानों से,
कि
इक घूँट भर आवाज
हो कम तृप्ति के लिए
किंतु
करती है शीतल प्राण को,
देती है ललक कि जियूँ और
कि देखूँ फिर एक सूरज
कि करूँ फिर एक प्रतीक्षा
अगली घूँट के अवदान की ;
इस खटाक खामोशी के बाद.
आज जब मेरे मोबाइल का नलका
गर्म पानियों के ही गिलास भरता रहा :
मेरी शुभांशा ने ढकेला परे
तमाम दुश्चिंताओं और आशंकाओं को
और दी मुझे सांत्वना कि
सरू सनोवर के देवोपवन की
ठंडी ठिठुरन भरे तेरे देस में
बस कि जमी रह गई होगी यूँ ही
मेरे हिस्से की ओस
सारा दिन तेरे होठों के गुलाब पर।
पिपासाकुल मैं
लेटा हूँ चिपटा कर इस मोबाइल को,
कि कह रहे हैं फ़ैज़ कानों में मेरे
“जो नहीं बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही”।
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मिस हो न जाए तुम्हारी काल,
डोलता रहा हूँ
मैं मोबाइल को मुट्ठी में लिए हुए,
कि लगता है वक्त काल लेने में
जेब से निकालकर
और कहीं
हो न जाएँ खामोश
घंटियाँ थक कर.
आग उगलती धूप के इस मौसम में
जीता रहा हूँ मैं
पीकर ओस कानों से,
कि
इक घूँट भर आवाज
हो कम तृप्ति के लिए
किंतु
करती है शीतल प्राण को,
देती है ललक कि जियूँ और
कि देखूँ फिर एक सूरज
कि करूँ फिर एक प्रतीक्षा
अगली घूँट के अवदान की ;
इस खटाक खामोशी के बाद.
आज जब मेरे मोबाइल का नलका
गर्म पानियों के ही गिलास भरता रहा :
मेरी शुभांशा ने ढकेला परे
तमाम दुश्चिंताओं और आशंकाओं को
और दी मुझे सांत्वना कि
सरू सनोवर के देवोपवन की
ठंडी ठिठुरन भरे तेरे देस में
बस कि जमी रह गई होगी यूँ ही
मेरे हिस्से की ओस
सारा दिन तेरे होठों के गुलाब पर।
पिपासाकुल मैं
लेटा हूँ चिपटा कर इस मोबाइल को,
कि कह रहे हैं फ़ैज़ कानों में मेरे
“जो नहीं बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही”।
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