Monday, August 29, 2011

सजा सख्त है बेगुनाही की यहाँ

एक मुद्दत हो गयी जबान को सुन्न पड़े हुए. आज कुछ कहा है -- पढ़ देखिए:

हर इक वार पर मुस्कराता हूँ
यूँ मैं जालिम को जलाता हूँ |

किए ख़ार अता हमें गुल ने
मम्नून हूँ, सर पे सजाता हूँ |

दरकुशाई तो अख्तियार उसका
मैं फ़कत फर्जे-आशिकी निभाता हूँ |

दिक न होवे वो बपहलुए रक़ीब
मैं दूर से सलाम बजा लाता हूँ |

सजा सख्त है बेगुनाही की यहाँ
इज्जे-मुंसिफ़ में चुप रह जाता हूँ |

ये तीरगी शदीद तर कि तूफ़ाँ ये
शम्मए दिल बारहा क्यूँ जलाता हूँ |

नालः चीज अक्सीर है सुजीत बड़ी
अश्के-रुख मैं इसी से सुखाता हूँ |
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Monday, June 20, 2011

मेरी एक लघुकथा

नेट पत्रिका लघुकथा.कॉम ने भी जून 2011 के कथादेश में प्रकाशित मेरी एक लघुकथा को अपने जून अंक में प्रकाशित किया है. आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं.

Sunday, March 20, 2011

लहू मिरा रायगाँ न था

फूल ने तितली से कुछ कहा न था
दरम्याँ अब बचा कोई मुद्दआ न था

झुका तो था वो हस्बे-मामूल ही
दह्‌न-ए-गुंचा आज नीम – वा न था

रंग ही रंग जमीं, गुलाल उफ़क में
होलियाना मगर इस शाम फ़ज़ा न था

यूँ गर्के-अब्र हो जाएगा बादे-कुर्बत
दह्र को मह पे इसका गुमाँ न था

उस आतशे खुशूशी की हयादारी वल्लाह
तपिश रूह-कुशाँ, मगर कोई धुआँ न था

रंग लिए परचम अपने जब हजारों ने
कहा बिस्मिल ने, लहू मिरा रायगाँ न था

वक्त मुंसिफ़ को बताएगा इक दिन जरूर
मायूस-‌ओ-नाचार था, सुजीत बदगुमां न था
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Saturday, March 19, 2011

होली की शुभकामनाएँ

होली का यह वसन्तोत्सव आपके जीवन - पथ को आपके चुने हुए रंगों के फूलों से सजाए –पथ के समस्त कण्टकों (और शुष्क मृणालों को भी)
होलिका के ही संग जलाए ।

Monday, March 14, 2011

किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे

इक बार कभी जिक्रे-खुदा तो मेरे दीवान में आवे
माहताब जो भूले से भी मेरे आसमान में आवे

बेकल तो रहते हैं हम उसकी सदा के लिए जरूर
इलाही कुछ लुत्फ उसे भी तो मेरे बयान में आवे

जाने है जमाना कि है शिफ़ा लम्स में उसके
हैफ़ किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे

बदहवास इतना है वो अपनी ही जुस्तजू में
कैसे छिन भर भी ये मुरीद उसके ध्यान में आवे

गुलाब चुन चुन जो रोज सजाता उसके लिए सुजीत
निशाँ इसके लहू का भी तो उस गुलदान में आवे
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Tuesday, March 8, 2011

मेरा साया सब्जाँ को रेत बना देता है


वह माहताब इतनी बुलन्दी पर बिस्तर रखता है
कभी खशो-खार-ओ-गुलाब नजर नहीं आता है

चलेगा कैसे वह गुँचा-पा मेरे साथ कदम भर भी
मेरा साया शबनमी सब्जाँ को रेत बना देता है

दर्द सिन्दूर का कहेगी किससे ये धरती की बेटी
राम परित्यागी, मनुहारी को जग रावण कहता है

इतना खोल दिया है खुद को उसके सामने हमने
इक वर्क अपना इस फटे बस्ते में धरते डरता है

हलक़ भींच के धोते हैं रुख अश्क से हम और
उसे शिकवा यह कि तू ताजा-दम न दिखता है

नफ़्स अपनी दबा रखे है सुजीत पा उसे फोन प
बेमुरव्वत अपनी गुफ्तगू को खत्म नहीं करता है

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Friday, December 31, 2010

नव वर्ष की शुभकामनाएँ


नव वर्ष सभी मित्रों को समस्त अभीष्ट प्राप्ति की सामर्थ्य तथा शुभ-मात्र की एषणा के विवेक से परिपूर्ण रखे.

Thursday, December 30, 2010

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं -- परवीन शाकिर की गज़ल

नींद तो ख्वाब हो गई शायद
जिन्से-नायाब हो गई शायद

अपने घर की तरह वो लड़की भी
नज्रे- सैलाब हो गई शायद

तुझ को सोचूँ तो रोशनी देखूँ ,
याद, महताब हो गई शायद

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं,
झील पायाब हो गई शायद

हिज्र के पानियों में इश्क की नाव,
कहीं गर्क़ाब हो गई शायद

चंद लोगों की दस्तरस में है
ज़ीस्त किमख़्वाब हो गई शायद
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Sunday, December 19, 2010

तीन सतरें

(एक)
सरदर्दी हर गाम हुई
बरजोरी सरे-शाम हुई
बेखौफ़ रहे ताकतों वाले
और मुन्नी बदनाम हुई।

(दो)
आ गई चीजें इतनी लगाने की
कि नींद हराम हुई जमाने की
सौदागर सपनों का बाजार बना
पर शीला किसी के हाथ न आने की।

(तीन)
उसके होंठ तले जो छोटा तिल है
बंदे का मुआ वही तो कातिल है
वह सुनारों संग घूमती रही और
ये गाएँ, फूल नहीं मेरा दिल है।
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Monday, November 29, 2010

फोन किसी का सुनते हुए

अभी ही जाना है, मायूस था वह जो यह पूछते हुए
रुख्सत याद दिलाया है, फोन किसी का सुनते हुए।

जिरह-बख्तर बेकद्री के, शम्शीरे-बदजुबानी लिए
शहंशाह-फ़हम हूँ, गैर की बस्ती में गुजरते हुए।

परख-परख के राह, फूंक-फूंक कदम जो रखते हैं
नावीनगी छाती है उन्हीं पर अक्सर फिसलते हुए।

जोर तमाम लगाया बगूलों ने गिराने में जिसे
मुअत्तर हवा को कर गया वह गुल संभलते हुए।

तनाबकुशाई न की रात भर असीरे-आरिजे कंवल ने
पासे-शिगाफ़े-गुल ने रोका उसे मुहर-ब-लब करते हुए।

यह नहीं हरगिज़ कि नामालूम  हकी़कते-दाम उसे
माइल-ब-मुनाज़ात-ए-माहीगीर  है वह फंसते हुए।

होशमंद है बहुत सुजीत आमदे-शफ़क़ तक हर रोज
ज़ाँ-ब-लबी आ जाती है बस खयाले-महवश आते हुए।
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इस रंग के पदों पर माउस रखने से आप उनके अर्थ देख सकते हैं |
यह व्यवस्था करने की सलाह देने वाले कवि मित्र श्री अजीत को धन्यवाद |