Tuesday, March 8, 2011

मेरा साया सब्जाँ को रेत बना देता है


वह माहताब इतनी बुलन्दी पर बिस्तर रखता है
कभी खशो-खार-ओ-गुलाब नजर नहीं आता है

चलेगा कैसे वह गुँचा-पा मेरे साथ कदम भर भी
मेरा साया शबनमी सब्जाँ को रेत बना देता है

दर्द सिन्दूर का कहेगी किससे ये धरती की बेटी
राम परित्यागी, मनुहारी को जग रावण कहता है

इतना खोल दिया है खुद को उसके सामने हमने
इक वर्क अपना इस फटे बस्ते में धरते डरता है

हलक़ भींच के धोते हैं रुख अश्क से हम और
उसे शिकवा यह कि तू ताजा-दम न दिखता है

नफ़्स अपनी दबा रखे है सुजीत पा उसे फोन प
बेमुरव्वत अपनी गुफ्तगू को खत्म नहीं करता है

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Friday, December 31, 2010

नव वर्ष की शुभकामनाएँ


नव वर्ष सभी मित्रों को समस्त अभीष्ट प्राप्ति की सामर्थ्य तथा शुभ-मात्र की एषणा के विवेक से परिपूर्ण रखे.

Thursday, December 30, 2010

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं -- परवीन शाकिर की गज़ल

नींद तो ख्वाब हो गई शायद
जिन्से-नायाब हो गई शायद

अपने घर की तरह वो लड़की भी
नज्रे- सैलाब हो गई शायद

तुझ को सोचूँ तो रोशनी देखूँ ,
याद, महताब हो गई शायद

एक मुद्दत से आँख रोई नहीं,
झील पायाब हो गई शायद

हिज्र के पानियों में इश्क की नाव,
कहीं गर्क़ाब हो गई शायद

चंद लोगों की दस्तरस में है
ज़ीस्त किमख़्वाब हो गई शायद
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Sunday, December 19, 2010

तीन सतरें

(एक)
सरदर्दी हर गाम हुई
बरजोरी सरे-शाम हुई
बेखौफ़ रहे ताकतों वाले
और मुन्नी बदनाम हुई।

(दो)
आ गई चीजें इतनी लगाने की
कि नींद हराम हुई जमाने की
सौदागर सपनों का बाजार बना
पर शीला किसी के हाथ न आने की।

(तीन)
उसके होंठ तले जो छोटा तिल है
बंदे का मुआ वही तो कातिल है
वह सुनारों संग घूमती रही और
ये गाएँ, फूल नहीं मेरा दिल है।
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Monday, November 29, 2010

फोन किसी का सुनते हुए

अभी ही जाना है, मायूस था वह जो यह पूछते हुए
रुख्सत याद दिलाया है, फोन किसी का सुनते हुए।

जिरह-बख्तर बेकद्री के, शम्शीरे-बदजुबानी लिए
शहंशाह-फ़हम हूँ, गैर की बस्ती में गुजरते हुए।

परख-परख के राह, फूंक-फूंक कदम जो रखते हैं
नावीनगी छाती है उन्हीं पर अक्सर फिसलते हुए।

जोर तमाम लगाया बगूलों ने गिराने में जिसे
मुअत्तर हवा को कर गया वह गुल संभलते हुए।

तनाबकुशाई न की रात भर असीरे-आरिजे कंवल ने
पासे-शिगाफ़े-गुल ने रोका उसे मुहर-ब-लब करते हुए।

यह नहीं हरगिज़ कि नामालूम  हकी़कते-दाम उसे
माइल-ब-मुनाज़ात-ए-माहीगीर  है वह फंसते हुए।

होशमंद है बहुत सुजीत आमदे-शफ़क़ तक हर रोज
ज़ाँ-ब-लबी आ जाती है बस खयाले-महवश आते हुए।
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इस रंग के पदों पर माउस रखने से आप उनके अर्थ देख सकते हैं |
यह व्यवस्था करने की सलाह देने वाले कवि मित्र श्री अजीत को धन्यवाद | 

Wednesday, October 20, 2010

ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है

वह माहताब को चरागे-सहर बना देता है
कभी कतरे को वह गुहर बना देता है ।

तासीर-ए-मेहर से अमीरे-शहर अक्सर
तुख्म-ए-गुल को शह-समर बना देता है ।

मुहब्बत की चिता का धुआँ कम्बख्त
शीरीं लबों को जाम-ए-जहर बना देता है ।

रब्त रसूखदारों से रखा करिए आप
ये बेहरूफ़ को भी सुखनवर बना देता है ।

इस्तेमाल करिए जो ज़ीने को जीने में
वह पिद्दी को भी नामवर बना देता है ।

मान लीजिए ये मशवरा सुजीत का वरना
ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है ।
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Sunday, October 17, 2010

विकास

अपने हरियाले अतीत का
एकमात्र गवाह,
विगत का स्मृतिचिह्न
बूढ़ा पीपल यह,
बड़ा जिद्दी, बड़े जीवट वाला है,
कि खड़ा है जबर्दस्ती
बीचोबीच सालों साल से,

चौतरफा खड़ी चिमनियाँ
वार करती हैं दिन-रात
और यह मरता ही नहीं.

यह तो और हुमक उठता है हर बरसात में.

और कारखाने की चारदीवारी
फैलती जाती है हर साल,
इसी पेड़ के वितान की तरह,

सिमटती जाती हैं
आश्रयस्थलियाँ
मक्कों की बालियों की.
दूब भाग रही थोड़ी जगह खोजने
लॉनों की तरफ,
नदियाँ
जल ले आती हैं
और मल ले जाती हैं,
पहाड़ छीजते हैं चिंता में
कि कम न पड़े गिट्टियों की सप्लाई.

और यह पीपल,
जिए जाता है
अतीत से दग्द्ध पर भविष्य से निश्चिंत.

किंतु हुआ है उदास पहली बार आज,
कि
घोंसले में चिड़ा कह रहा था चिड़ी को
“चलें कहीं और,
यहाँ विकास बहुत हो गया है.”
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परी

यह परीकथा ही थी
उस चीकट लड़की के लिए :

चौराहे पर रुकी बड़ी गाड़ी
और उसमें बैठी छुटकी मेमसाब ने
पकड़ा दिया
खिड़की के पास खड़ी उसे
नीला पैकेट चाकलेट का.

बड़े साहब मेमसाहब को बोले
“क्या उजबक बेटी है तेरी”

और वह सोच ही रही थी
बड़े लोग परी को उजबक कहते हों शायद,
कि
बत्ती हरी हो गई.
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रक्त

रक्त
अति महत्वपूर्ण
निर्विवाद घटक है
विकास का,

कि
रूपांतर परियोजनाओं का
हरित-भू से लोहित-भू में
होता है
तल पर अपार रक्तपात के ही बाद
और
जरूरी होता है
रक्तिम रंग
करने के लिए प्रदान
विनिवेश योग्यता
खनन क्षेत्रों को भी.

धुलाते हैं लोग कई बार
व्यवस्थाओं की कालिमा भी
लाल पानियों से
हरित आखेटों के.
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Thursday, October 14, 2010

सामग्री प्रापण रणनीति (Procurement as a driver of Competitive Advantage)

व्यावसायिक संस्थानों में सामग्री प्रापण की सम्यक रणनीति के लाभ (Procurement as a driver of Competitive Advantage) पर एक अंग्रेज़ी आलेख यहाँ प्रस्तुत है।