नेट पत्रिका लघुकथा.कॉम ने भी जून 2011 के कथादेश में प्रकाशित मेरी एक लघुकथा को अपने जून अंक में प्रकाशित किया है. आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं.
Monday, June 20, 2011
मेरी एक लघुकथा
Sunday, March 20, 2011
लहू मिरा रायगाँ न था
फूल ने तितली से कुछ कहा न था
दरम्याँ अब बचा कोई मुद्दआ न था
झुका तो था वो हस्बे-मामूल ही
दह्न-ए-गुंचा आज नीम – वा न था
रंग ही रंग जमीं, गुलाल उफ़क में
होलियाना मगर इस शाम फ़ज़ा न था
यूँ गर्के-अब्र हो जाएगा बादे-कुर्बत
दह्र को मह पे इसका गुमाँ न था
उस आतशे खुशूशी की हयादारी वल्लाह
तपिश रूह-कुशाँ, मगर कोई धुआँ न था
रंग लिए परचम अपने जब हजारों ने
कहा बिस्मिल ने, लहू मिरा रायगाँ न था
वक्त मुंसिफ़ को बताएगा इक दिन जरूर
मायूस-ओ-नाचार था, सुजीत बदगुमां न था
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दरम्याँ अब बचा कोई मुद्दआ न था
झुका तो था वो हस्बे-मामूल ही
दह्न-ए-गुंचा आज नीम – वा न था
रंग ही रंग जमीं, गुलाल उफ़क में
होलियाना मगर इस शाम फ़ज़ा न था
यूँ गर्के-अब्र हो जाएगा बादे-कुर्बत
दह्र को मह पे इसका गुमाँ न था
उस आतशे खुशूशी की हयादारी वल्लाह
तपिश रूह-कुशाँ, मगर कोई धुआँ न था
रंग लिए परचम अपने जब हजारों ने
कहा बिस्मिल ने, लहू मिरा रायगाँ न था
वक्त मुंसिफ़ को बताएगा इक दिन जरूर
मायूस-ओ-नाचार था, सुजीत बदगुमां न था
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Saturday, March 19, 2011
होली की शुभकामनाएँ
होली का यह वसन्तोत्सव आपके जीवन - पथ को आपके चुने हुए रंगों के फूलों से सजाए –पथ के समस्त कण्टकों (और शुष्क मृणालों को भी)
होलिका के ही संग जलाए ।
होलिका के ही संग जलाए ।
Monday, March 14, 2011
किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे
इक बार कभी जिक्रे-खुदा तो मेरे दीवान में आवे
माहताब जो भूले से भी मेरे आसमान में आवे
बेकल तो रहते हैं हम उसकी सदा के लिए जरूर
इलाही कुछ लुत्फ उसे भी तो मेरे बयान में आवे
जाने है जमाना कि है शिफ़ा लम्स में उसके
हैफ़ किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे
बदहवास इतना है वो अपनी ही जुस्तजू में
कैसे छिन भर भी ये मुरीद उसके ध्यान में आवे
गुलाब चुन चुन जो रोज सजाता उसके लिए सुजीत
निशाँ इसके लहू का भी तो उस गुलदान में आवे
********
माहताब जो भूले से भी मेरे आसमान में आवे
बेकल तो रहते हैं हम उसकी सदा के लिए जरूर
इलाही कुछ लुत्फ उसे भी तो मेरे बयान में आवे
जाने है जमाना कि है शिफ़ा लम्स में उसके
हैफ़ किसी रोज दर्द मेरा भी तो उठान में आवे
बदहवास इतना है वो अपनी ही जुस्तजू में
कैसे छिन भर भी ये मुरीद उसके ध्यान में आवे
गुलाब चुन चुन जो रोज सजाता उसके लिए सुजीत
निशाँ इसके लहू का भी तो उस गुलदान में आवे
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Tuesday, March 8, 2011
मेरा साया सब्जाँ को रेत बना देता है
वह माहताब इतनी बुलन्दी पर बिस्तर रखता है
कभी खशो-खार-ओ-गुलाब नजर नहीं आता है
चलेगा कैसे वह गुँचा-पा मेरे साथ कदम भर भी
मेरा साया शबनमी सब्जाँ को रेत बना देता है
दर्द सिन्दूर का कहेगी किससे ये धरती की बेटी
राम परित्यागी, मनुहारी को जग रावण कहता है
इतना खोल दिया है खुद को उसके सामने हमने
इक वर्क अपना इस फटे बस्ते में धरते डरता है
हलक़ भींच के धोते हैं रुख अश्क से हम और
उसे शिकवा यह कि तू ताजा-दम न दिखता है
नफ़्स अपनी दबा रखे है सुजीत पा उसे फोन प
बेमुरव्वत अपनी गुफ्तगू को खत्म नहीं करता है
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Friday, December 31, 2010
नव वर्ष की शुभकामनाएँ
नव वर्ष सभी मित्रों को समस्त अभीष्ट प्राप्ति की सामर्थ्य तथा शुभ-मात्र की एषणा के विवेक से परिपूर्ण रखे.
Thursday, December 30, 2010
एक मुद्दत से आँख रोई नहीं -- परवीन शाकिर की गज़ल
नींद तो ख्वाब हो गई शायद
जिन्से-नायाब हो गई शायद
अपने घर की तरह वो लड़की भी
नज्रे- सैलाब हो गई शायद
तुझ को सोचूँ तो रोशनी देखूँ ,
याद, महताब हो गई शायद
एक मुद्दत से आँख रोई नहीं,
झील पायाब हो गई शायद
हिज्र के पानियों में इश्क की नाव,
कहीं गर्क़ाब हो गई शायद
चंद लोगों की दस्तरस में है
ज़ीस्त किमख़्वाब हो गई शायद
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जिन्से-नायाब हो गई शायद
अपने घर की तरह वो लड़की भी
नज्रे- सैलाब हो गई शायद
तुझ को सोचूँ तो रोशनी देखूँ ,
याद, महताब हो गई शायद
एक मुद्दत से आँख रोई नहीं,
झील पायाब हो गई शायद
हिज्र के पानियों में इश्क की नाव,
कहीं गर्क़ाब हो गई शायद
चंद लोगों की दस्तरस में है
ज़ीस्त किमख़्वाब हो गई शायद
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Sunday, December 19, 2010
तीन सतरें
(एक)
सरदर्दी हर गाम हुई
बरजोरी सरे-शाम हुई
बेखौफ़ रहे ताकतों वाले
और मुन्नी बदनाम हुई।
(दो)
आ गई चीजें इतनी लगाने की
कि नींद हराम हुई जमाने की
सौदागर सपनों का बाजार बना
पर शीला किसी के हाथ न आने की।
(तीन)
उसके होंठ तले जो छोटा तिल है
बंदे का मुआ वही तो कातिल है
वह सुनारों संग घूमती रही और
ये गाएँ, फूल नहीं मेरा दिल है।
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सरदर्दी हर गाम हुई
बरजोरी सरे-शाम हुई
बेखौफ़ रहे ताकतों वाले
और मुन्नी बदनाम हुई।
(दो)
आ गई चीजें इतनी लगाने की
कि नींद हराम हुई जमाने की
सौदागर सपनों का बाजार बना
पर शीला किसी के हाथ न आने की।
(तीन)
उसके होंठ तले जो छोटा तिल है
बंदे का मुआ वही तो कातिल है
वह सुनारों संग घूमती रही और
ये गाएँ, फूल नहीं मेरा दिल है।
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Monday, November 29, 2010
फोन किसी का सुनते हुए
अभी ही जाना है, मायूस था वह जो यह पूछते हुए
रुख्सत याद दिलाया है, फोन किसी का सुनते हुए।
जिरह-बख्तर बेकद्री के, शम्शीरे-बदजुबानी लिए
शहंशाह-फ़हम हूँ, गैर की बस्ती में गुजरते हुए।
परख-परख के राह, फूंक-फूंक कदम जो रखते हैं
नावीनगी छाती है उन्हीं पर अक्सर फिसलते हुए।
जोर तमाम लगाया बगूलों ने गिराने में जिसे
मुअत्तर हवा को कर गया वह गुल संभलते हुए।
तनाबकुशाई न की रात भर असीरे-आरिजे कंवल ने
पासे-शिगाफ़े-गुल ने रोका उसे मुहर-ब-लब करते हुए।
यह नहीं हरगिज़ कि नामालूम हकी़कते-दाम उसे
माइल-ब-मुनाज़ात-ए-माहीगीर है वह फंसते हुए।
होशमंद है बहुत सुजीत आमदे-शफ़क़ तक हर रोज
ज़ाँ-ब-लबी आ जाती है बस खयाले-महवश आते हुए।
********
इस रंग के पदों पर माउस रखने से आप उनके अर्थ देख सकते हैं |
यह व्यवस्था करने की सलाह देने वाले कवि मित्र श्री अजीत को धन्यवाद |
रुख्सत याद दिलाया है, फोन किसी का सुनते हुए।
जिरह-बख्तर बेकद्री के, शम्शीरे-बदजुबानी लिए
शहंशाह-फ़हम हूँ, गैर की बस्ती में गुजरते हुए।
परख-परख के राह, फूंक-फूंक कदम जो रखते हैं
नावीनगी छाती है उन्हीं पर अक्सर फिसलते हुए।
जोर तमाम लगाया बगूलों ने गिराने में जिसे
मुअत्तर हवा को कर गया वह गुल संभलते हुए।
तनाबकुशाई न की रात भर असीरे-आरिजे कंवल ने
पासे-शिगाफ़े-गुल ने रोका उसे मुहर-ब-लब करते हुए।
यह नहीं हरगिज़ कि नामालूम हकी़कते-दाम उसे
माइल-ब-मुनाज़ात-ए-माहीगीर है वह फंसते हुए।
होशमंद है बहुत सुजीत आमदे-शफ़क़ तक हर रोज
ज़ाँ-ब-लबी आ जाती है बस खयाले-महवश आते हुए।
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इस रंग के पदों पर माउस रखने से आप उनके अर्थ देख सकते हैं |
यह व्यवस्था करने की सलाह देने वाले कवि मित्र श्री अजीत को धन्यवाद |
Wednesday, October 20, 2010
ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है
वह माहताब को चरागे-सहर बना देता है
कभी कतरे को वह गुहर बना देता है ।
तासीर-ए-मेहर से अमीरे-शहर अक्सर
तुख्म-ए-गुल को शह-समर बना देता है ।
मुहब्बत की चिता का धुआँ कम्बख्त
शीरीं लबों को जाम-ए-जहर बना देता है ।
रब्त रसूखदारों से रखा करिए आप
ये बेहरूफ़ को भी सुखनवर बना देता है ।
इस्तेमाल करिए जो ज़ीने को जीने में
वह पिद्दी को भी नामवर बना देता है ।
मान लीजिए ये मशवरा सुजीत का वरना
ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है ।
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कभी कतरे को वह गुहर बना देता है ।
तासीर-ए-मेहर से अमीरे-शहर अक्सर
तुख्म-ए-गुल को शह-समर बना देता है ।
मुहब्बत की चिता का धुआँ कम्बख्त
शीरीं लबों को जाम-ए-जहर बना देता है ।
रब्त रसूखदारों से रखा करिए आप
ये बेहरूफ़ को भी सुखनवर बना देता है ।
इस्तेमाल करिए जो ज़ीने को जीने में
वह पिद्दी को भी नामवर बना देता है ।
मान लीजिए ये मशवरा सुजीत का वरना
ये ज़माना यूसुफ़ को पत्थर बना देता है ।
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