Tuesday, June 29, 2010

ग़ज़ल एक मेरी फिर

जो लोग उफनती मौज़ों से डर गए
वो सब के सब कनारों प’ ठहर गए ।

इस हिकारत से उन्हें पुकारा उसने
शर्मसार होके अश’आर मिरे मर गए ।

डोर दिल से उनकी बंधी थी यों कर
मोती तमाम पलकों पर ही ठहर गए ।

मंजिले-मकसूद थी सोहबत-ए-रहबर
इसीलिए कई लोग जानिबे-सफर गए ।

देखा बागवां को कैंची जो सीमी लिए
गुलाब सारे ही बाग के बिखर गए ।

दरिया को इतनी थी फ़िक्रे तश्‍नगी
सैलाब आया 'सुजीत' हम जिधर गए ।
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3 comments:

आचार्य जी said...

sundar lekhan .

Jandunia said...

उम्दा गजल

Maria Mcclain said...

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