Sunday, December 25, 2011

अप्रील 2010 की एक और कविता -- पूर्ण सम्पूर्ण


अपनी पूर्ण सम्पूर्णता से
ईश्वर ने अपूर्ण किया मुझे
कि जीभ तक न दी पूरी
और
उचरे न कभी शुद्ध
मेरे शब्द.

और
हा
तुमने तो कभी
सोचा ही नहीं कि
नज़र से सुनो मुझे.

डोब कर उँगली अपने व्रणों में
उकेरे हैं मैंने चित्र कुछ
किंतु तुमने देखा नहीं है
उन भोजपत्रों को,

कि

रक्ताक्त पत्र पुष्प
ले नहीं जाए जाते
वरदायिनी के मंदिर में
और
बेला, अगर, चंदन, रोली
ईश्वर ने दिये नहीं मुझे.
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1 comment:

Ravindra said...

बहुत ही सुंदर http://blog.irworld.in/

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